गुरुवार, 13 अगस्त 2020

रूठ ना जाना "मैं जो कहूँ तो"



कहाँ एक हफ़्ते का मिडसेमेस्टर ब्रेक और कहाँ ये लॉकडाउन! महामारी के इन पाँच महीनों में मैंने गिनी-चुनी किताबें पढ़ीं। मैंने इन्हीं किताबों के सहारे से 'दिल्ली से कलकत्ता' की सैर की लेकिन पैदल नहीं बल्कि एक डगमग डोंगी में जहाँ मैं एक सामान्य-सी परंतु विशेष महिला "कविता" से मिली। "विशेष" और "सामान्य" जैसे शब्दों का इस्तेमाल इस लिए कर रही हूँ क्योंकि वो सब के लिए एक सामान्य-सी औरत है पर मेरे लिए एक विशेष स्त्री है। ख़ैर, अपना ये सफ़रनामा मैं फिर कभी दुबारा सुनाऊँगी। अभी तो इस लॉकडाउन सफ़र में थोड़ा और घूमना है और कुछ न कुछ नया करते रहना है। और वैसे भी खाली बैठे शरीर भले ही सुस्त हो जाये पर दिमाग एक दम तेज़ हो जाता है। ऐसे में तेज़ दिमाग में आने वाले विचारों को कुछ सहेज के, सजा के अच्छे से प्रस्तुत किया जाए तो शायद कुछ बढ़िया मिल जाये! घर पर बैठे मन यादें बुनने लगता है, ऐसी ही कुछ यादें मेरे दिलोदिमाग में भी हैं। उन्ही में से एक किस्सा आपको भी सुनाती हूँ।