"सावन के अंधे को सब जगह हरा ही दीखता है" वैसे ही कला के प्रेमी को भी हर जगह कला ही दिखती है। एक अच्छा कलाकार ही हर जगह अपनी प्रतिभा दिखा सकता है। फिर चाहे वो चित्रकार हो, संगीतकार हो, शिल्पकर हो या नृतक।
एक कलाकार और लेखक ही है जो अपने चिंतन से किसी भी नई चीज/दृश्य का सृजन कर सकता है और अपनी सृजनात्मकता के ज़रिये अनहोनी को होनी में तब्दील करने का रुतबा रखता है। जब एक चित्रकार अपने औज़ारों को अपने हाथ में लेता है तो यह सोचकर कभी नहीं लेता कि आसमान नील रंग का होता है तो मैं भी नीला रंग ही करूँगा या पत्तियां केवल हरे रंग की ही होती है। एक चित्रकार हमेशा अपने औज़ारों को यह सोच कर हाथ में लेता है कि जब मेरा काम पूरा हो जायेगा या चित्र पूरा होने के बाद जब मैं पीछे हटूंगा तो सारी दुनिया उस चित्र को देखने के लिए आगे बढ़ेगी। यह हर कलाकार की इच्छा होती है कि मैं एक सुन्दर और अकाल्पनिक चित्र का निर्माण करू जिसे देख हर व्यक्ति की भावात्मकता का उजागर हो।
अगर हम बात करे संगीत की तो इसे सदियों से लोगों की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम मना गया है। फिर चाहे वो प्रेमरोग हो या वियोग, दुःख की घड़ी हो या हर्षोउल्लास का जशन। हर व्यक्ति अपने सभी भावों को संगीत के माध्यम से प्रकट करता है। यह एक कलाकार की खूबी ही है कि यदि कोई सृजनात्मक चित्रकार अगर किसी म्यूज़िक/गाने को सुनता है तो उसके ज़हन में सबसे पहले एक ही ख्याल आता है- "आई वांट टू ड्रा दिस म्युज़िक"। उसी तरह जब एक रचनात्मक संगीतकार किसी चित्र को देखता है तो वह यह इच्छा रखता है- "आई वांट टू सिंग दिस पेंटिंग"। हर कलाकार हर कला में अपनी कला का अनुभव करता है यही एक कलाकार की खूबी होती है।
यू तो अगर हम "गूगल" पर "कला क्या है?" सर्च करें तो भी हमे पता चल जायेगा कि "कला क्या है?" गूगल भी आप को कला से परिचित करवा देगा, पर वह केवल आप को कला की एक लिखित परिभाषा से अवगत कराएंगा। यदि गूगल ही कला का परिचय करा दे तो सब ही कलाकार नहीं कहलाएंगे? कला एक प्राथमिक गुण है जो किसी न किसी रूप में सभी के पास विद्यमान रहती है। बस उसे परखने की देरी है। जैसे किसी को चित्र बनाना पसंद है, किसी को गाने सुनना और गाना, किसी को खाना बनाना और किसी को किताबें पड़ना और किसी को लोगों को हँसाना। हमे जो कार्य करना अच्छा लगता है या पसंद होता है वो भी हमारी कला में सुमार हो जाता है पर बशर्तें वो हमारी मज़बूरी न हो तो। कला के आभाव में व्यक्ति बिना सींग और पूछ का पशु कहलाता है। संस्कृत में यही पंक्तिया कुछ इस प्रकार हैं-साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन:।।
इसीलिए कला तो हर व्यक्ति में होती है पर कल को परखना उसे आना चाहिए।

Very nice bolg your words are very nice👌👌
जवाब देंहटाएंWow tumne to apni kalaa parakh li😊😊
जवाब देंहटाएंविद्या, मानवीय कला पर लिखा हुआ तुम्हारा ये कन्टेन्ट वाकई में क़ाबिले तारीफ है। बधाई आपको, अच्छा लिखा है आपने और सहज भाषा में लिखा है। लिखते रहिए, तुम्हारी ये कला मुझे उम्दा लगी। 💖👌👌
जवाब देंहटाएंVery good
जवाब देंहटाएंBhot hi vadiya 👌👌👌 keep it up
जवाब देंहटाएंशानदार
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