सुना है गाँव में विकास हो रहा है, अब सड़के गाँव तक पहुँच रही हैं। कितनी ख़ुशी की बात है ना!! अब सभी ग्रामीण शहर की ओर अपना रुख मोड़ लेंगे और सभी पर्यटक और उद्योगपति गाँवों की तरफ। अब अगर सड़कों को गाँव की ओर मोड़ना है तो सड़कों के लिए तो प्रयाप्त जगह की आवश्यकता होगी ही और इस आवश्यकता की पूर्ति गाँव के लोगों और किसानों के खेतों से की जायेगी। देखा जाये तो इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं है, भई अगर गाँव का विकास चाहते हो, गाँव तक सड़के चाहते हो तो खेतों की क़ुरबानी करनी ही पड़ेगी। अरे भई कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता है.....है कि नहीं।
अब सड़के बननी शुरू हो गई हैं तो लोगों की आवा-जावी तो होगी ही। और तो और कहीं कहीं तो बन के तैयार होने को है और लोग भी गाँवों की ओर आने लगे हैं। अब तो बस एक ही काम रह गया है, ये जो गाँव के विकास के नाम पर शहर बसाये जा रहे हैं, इनका नाम भी बदल कर शहरी कर दिया जाये। अब माना भले ही गाँव वाले भोले होते हैं पर मुर्ख थोड़ी होतें हैं कि वो समझ न सके की गाँव का विकास हो रहा है या गाँवों का शहरीकरण।
हाँ पर हमें इस के लिए सरकार को दोष नही देना चाहिए। माँग तो हमारी ही थी की गाँवों का भी शहरों जैसा विकास हो अर्थात गाँव में भी बिजली की व्यवस्था हो, हर घर में शौचालय हो और गाँव के हर व्यक्ति को सरकार की योजनाओं का लाभ मिल सके, इसके लिए हर गाँव में एक-एक सरकारी कार्यालय हो। पर शायद हमारा संप्रेक्षण सही अर्थ में सरकार तक पहुँच नहीं पाया। इसी लिए सरकार ने गाँवों के विकास का कार्य शुरू तो किया पर अपने तरीके से। पहले गाँव तक सड़के आई, जिसमे कई गाँव वालों के खेत और घर चले गये, फिर जब रहने और खाने को कुछ रहा नहीं तो लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया। लोग अपना घर-परिवार ले कर शहर की ओर विस्थापित होने लगे। जब धीरे-धीरे गाँव खली होने लगे तो बाकि की बचि उस ज़मीं पर औद्योगपतियों ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। कुछ इस तरह हुआ गाँवों का शाहरिक.......मतलब गाँवों का विकास।

Bhot uttam 👌👌👌👌
जवाब देंहटाएंAchha prayas 👌👌
जवाब देंहटाएंBhut acha likha h
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