आपने अमूमन यह गाना "ऐसा देश है मेरा" सुना होगा... वर्ष 2004 में आई फ़िल्म "वीर-ज़ारा" के इस गाने में मेले की खूबसूरती को परंपरागत भारतीय संस्कृति के अनुसार बखूबी दर्शाया गया है। ऐसी ही एक खूबसूरत भरतीय संस्कृति से आज मैं आपको मिलवाने जा रही हूँ। आपका अपने कस्बे में लगने वाले मेले से मन ऊभ गया हो तो हरियाणा राज्य स्थित फरीदाबाद शहर में लगने वाले सूरज कुंड मेले का साक्षात दर्शन करने ज़रूर जाइएगा। सन् 1987 में शुरू हुआ यह मेला जिसकी उम्र आज तकरीबन 34 वर्ष की हो गई है, उतनी ही खूबसूरती समटे हुए है, जितना कि यह 1987 में प्रसिद्ध था बल्कि हर साल इसकी लोकप्रियता में और चार-चांद लग जाते हैं। इस साल हुए सूरज कुंड मेले की थीम हिमाचल प्रदेश रखी गई थी जिसे देखने के लिए लाखों की जनसंख्या में वहां पर जुलूस उमड़ पड़ा। दर्शकों ने हिमाचल प्रदेश की संस्कृति को मेले में अनुभव किया। इस बार इन दर्शकों का हिस्सा मैं भी बनी। जो लोग गए वो मेले का लुत्फ उठा आए और जो नहीं जा सके उन्हें लिए चलती हूँ मैं अपने इस लेख के ज़रिए।
भिन्न-भिन्न कलाकारों की कलाकारी से सुसज्जित इस मेले में अनगिनत लोग, ढेर सारे झूले, खाने-पीने को कई प्रकार का खाना-पीना और चाट। खरीदारी करने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों की मशहूर वस्तुएं व व्यंजन मिल रहे होते हैं। लाल-पीले, हरे-भूरे रंग के बालों वाले विदेशी दर्शक आपका-हमारा, हम सभी का मन मोह लेते हैं। हर साल बुजुर्गों सहित छात्रों, दिव्यांगजनों के लिए ऑनलाइन/ऑफ़लाइन टिकट बुकिंग करने पर 50 प्रतिशत की छूट रहती है जो कि हर साल के लिए तय राशि है। थोड़ा लालच, थोड़ा उल्लास लिए परिजन अपने प्रियजनों को मेले में झूला झुलाने के लिए और कुछ अपने प्रेम रस में चाट का चटपटा रस घोल, स्वाद में इज़ाफ़ा लिए बेहद खुश दिखाई पड़ते हैं। युवाओं का क्या ही कहना! कुछों को सेल्फी-सेल्फी खेलने से फुरसत नहीं होती है तो कुछ अपनी यारी-दोस्ती में मशगूल मेले का लुत्फ़ उठाते नज़र आते हैं। आपको मेले में कुछ ऐसे छोटे बच्चे तथा युवा भी देखने को मिल जाएंगे जिन्होंने शायद अरसों से ढोल-नगाड़ों की धम-धम, डम-डम की आवाज नहीं सुनी होती है जिस वजह से उनके पैर रुके नहीं बल्कि ढोल-नगाड़ों की आवाज पर थिरकते नज़र आते हैं।
नज़ारा कुछ यूँ होता है कि 50-50 रुपए में पगड़ी/साफा बांधा जा रहा होता है। अब सिर्फ 50 रुपए में मुखिया वाली फील मिल जाए फिर तो वाह! जी वाह! जिस नई पीढ़ी ने कभी मिट्टी के बर्तनों में खाना-पीना न किया हो वही पीढ़ी मेले में कुम्हार के चक्र पर मिट्टी का मटका बना रही होती है और अपने दोस्तों से उस आत्मीयता को स्पर्श करने वाले माहौल का वीडियो बनवा रही होती है। मैंने मेले में जितना कुछ देखा आपको बताने की पूरी कोशिश की लेकिन एक नज़ारा मेरे ज़हन से उतारे नहीं उतरता है। हुआ यूँ कि एक लड़का अपनी रूठी दोस्त को मानने के लिए वहीं मेले में बीच सड़क पर पंथी लगाकर बैठ गया लेकिन लड़की भी ढीठ थी माने नहीं मान रही थी। देख कर अच्छा लगा और ख्याल आया...... खैर कहीं न कहीं मानना-मनाना मॉर्डन युग में भी बाकी है वरना आज रूठे हुए को पूछता कौन है! शायद इसीलिए लोगों ने ज़्यादातर रूठना बंद कर दिया।
मेले में कई रंग नए देखने को मिले जो इससे पहले मैंने नहीं देखे थे जिनमें से कई रंग मैं अपनी यादों में समेट लाई हूँ और बिखेर दिए हैं अपने इस छोटे से लेख के ज़रिए आप के सामने।

❣️👌👌✨✨
जवाब देंहटाएंShukriya bhaiya
हटाएंIt's so brilliant 👏👏👏😊👌
जवाब देंहटाएंThank you 😊
हटाएं👌👌
जवाब देंहटाएं👌👌👌
जवाब देंहटाएंNice
Thanks di🌸
हटाएंशानदार रचना हैं। ❤️🙏
जवाब देंहटाएंशुक्रिया🌸
हटाएंNice vidhya ....Keep it up
जवाब देंहटाएंThanks di🌸
हटाएंNice effort vidya...Keep it up and best wishes..
जवाब देंहटाएंThank you sir😊
हटाएंNice
जवाब देंहटाएं✨✨✨
जवाब देंहटाएंBhot khubsurat🌸
जवाब देंहटाएं👌👌bhot khub
जवाब देंहटाएं👌👌
जवाब देंहटाएंलाजवाब❣️🌸🌸💝
जवाब देंहटाएंबढ़िया विद्या
जवाब देंहटाएंलिखते रहो
बहुत खूबसूरत शब्दों से बांधा है विद्या। ऐसे ही आगे बढ़ो। पढ़ के दिल खुश हुआ।
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